नमाज़ पढ़ने वाले को सब से पहले अपने कपड़े आदि को पवित्र करना होता है। नमाज़ी के लिए ज़रूरी है कि नमाज़ पढ़ने से पहले अपने शरीर और कपड़े से हर प्रकार की गंदगी को दूर करे और खुशबू का प्रयोग करे। यह तो विदित रूप की पवित्रता के लिए ज़रूरी है लेकिन नमाज़ जिस तरह की उपासना है उसके लिए भीतरी पवित्रता भी बेहद ज़रूरी होती है। नमाज़ पूरी तरह से उसी समय प्रभावशाली होती है जब शरीर व कपड़ों के साथ ही नमाज़ी की आत्मा, ज़बान और उसका व्यवहार भी पवित्र हो। विदित रूप से हर नमाज़ी को एक निर्धारित समय पर एक निर्धारित दिशा की ओर मुंह करके नमाज़ पढ़ना होती है लेकिन अस्ल चीज़ ध्यान देना है। इन्सान के मन में पूरी नमाज के दौरान यह होना चाहिए कि वह महान ईश्वर के सामने उसके दरबार में खड़ा है इस लिए मन में इधर- उधर के विचार नहीं आने चाहिए। पैगम्बरे इस्लाम के पौत्र इमाम जाफरे सादिक़ अलैहिस्सलाम कहा करते थे कि जो भी पूरे ध्यान से दो रकअत नमाज़ पढ़े और यह जाने कि वह क्या कह रहा है तो जब उसकी नमाज़ खत्म होगी तो उसके और ईश्वर के मध्य कोई पाप बचा नहीं रहेगा।
नमाज़ में ध्यान लगाना और ईश्वर के सामने गिड़गिड़ाना भी बेहद महत्वपूर्ण है। नमाज़ के समय नमाज़ का तन- मन सब उस ईश्वर के सामने पूरी तरह से समर्पित रहना चाहिए जिसके सामने खड़ा हो कर वह नमाज़ पड़ रहा होता है। कुरआने मजीद में भी इस प्रकार के लोगों की तारीफ की गयी है। कुरआन में कहा गया है कि निश्चित रूप से ईमान लाने वाले सफल हैं वह लो जो नमाज़ पूरी तन्मयता और विनम्रता से पढ़ते हैं।
नमाज़ को और बेहतर बनाने का एक दूसरा गुण उसमें सच्ची भावना का होना है। मतलब नमाज़ी जब नमाज़ के लिए खड़ा हो तो उसके दिल में केवल ईश्वर का ही विचार हो और वह ईश्वर के लिए ही नमाज़ पढ़े और नमाज़ पढ़ने के पीछे कोई और भावना न हो। पैगम्बरे इस्लाम ने कहा है कि ईश्वर कहता है कि जब मैं यह देखता हूं कि मेरा कोई दास मेरी प्रसन्नता के लिए मेरे आदेशों का पालन करता है तो मैं उसके कामों को बेहतर और उसके जीवन का संचालन स्वंय करने लगता हूं। इस सिलसिले में निश्चित रूप से पैगम्बरे इस्लाम सबसे बेहतर आदर्श हैं जिन्हें ईश्वर आदेश देता है कि कहो कि निश्चित रूप से मेरी नमाज़, मेरी उपासना, मेरा जीवन और मेरी मौत सब इस सृष्टि के पालनहार के लिए है।
जब कोई व्यक्ति इन सभी विशेषताओं के साथ और पवित्र आत्मा व शरीर व मन के साथ नमाज़ पढ़ता है तब उसके भीतर ईश्वरीय प्रेम का आभास और उसके परिणाम में असीम सुख की भावना जागृत होती है और यह सुख उसे इतना भाता है कि फिर उसके सामने उसे कोई भी सुख अच्छा नहीं लगता।
हज़रत अली अलैहिस्सलाम वही सुख पाते थे यही वजह है कि वे फरमाते हैं कि हे पालनहार! तू हर दोस्त से अधिक बड़ा दोस्त है और जो तुझ पर भरोसा करते हैं उन सबकी मदद के लिए तू सब से अधिक तत्पर है। उनके दिलों की गहराइयों में तू बसता है और उनके मन की बात से तू अवगत होता है। उनके रहस्य तुझ पर प्रकट हैं और उनके दिल तेरे वियोग में तड़पते हैं। अगर कभी अकेलापन उन्हें सताता है तो वह तुझे याद करते हैं तो उनका मन शांत हो जाता है और अगर वह कठिनाई में पड़ते हैं तो तेरी शरण में जाते हैं।
यही वजह है कि ईश्वर की उपासना का सुख जिन्हें मिल जाता है और जो लोग इस असीम आंनद के सागर तक पहुंच जाते हैं तो फिर उसे किसी भी दशा में छोड़ना पसंद नहीं करते और कड़े से कड़े समय में भी कुछ देर अपने ईश्वर के समक्ष हाज़िरी का अवसर तलाश लेते हैं। इतिहास साक्षी है कि सिफ्फीन का युद्ध पूरे चरम पर था उसी दौरान हज़रत अली अलैहिस्सलाम के एक साथी ने देखा कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम बार- बार सूरज को देख रहे हैं। वह निकट गया और पूछा कि आप क्या कर रहे हैं? इमाम ने फरमाया कि मैं सूरज को देख रहा हूं कि कब नमाज़ का समय होगा? उसने हैरत से कहाः क्या इन हालात में भी नमाज़ पढ़ी जा सकती है? युद्ध की वजह से हम नमाज़ कैसे पढ़ सकते हैं? इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि हम किस लिए मुआविया की सेना से युद्ध कर रहे हैं? क्या हम उससे नमाज़ के लिए युद्ध नहीं कर रहे हैं?
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम भी उसी घराने में पले बढ़े थे। वह भी हज़रत अली अलैहिस्सलाम के पुत्र थे। यही वजह है कि दसवीं मुहर्रम को जब दोपहर हुई तो उन्होंने अपने कुछ साथियों के साथ यज़ीद के दसियों हज़ार की सेना के साथ जारी युद्ध को रोक दिया और अपने कुछ साथियों के साथ नमाज़ आरंभ कर दी। इस दौरान उनके कुछ साथी सामने खड़े हो गये ताकि यज़ीदी सेना के हमलों को रोका जा सके उन लोगों ने इसी हालत में अपनी जान इमाम हुसैन पर न्योछावर कर दी।
इन दोनों घटनाओं का एक ही संदेश है और वह यह कि नमाज़ इतनी महत्वपूर्ण उपासना है कि उसे युद्ध के दौरान भी भुलाया नहीं जा सकता। कहा जाता है कि जब भी नमाज़ पढ़ो तो एेसे पढ़ो जैसे यह तुम्हारे जीवन की अंतिम नमाज़ है और हो सकता है कि मौत अगली नमाज़ का अवसर न दे। यह उसी तरह है जैसा कि हम किसी बहुत बड़ी हस्ती के दरबार में जाएं तो फिर हमें यह पता नहीं होता कि दोबारा यह अवसर मिलेगा या नहीं? फिर जब हम नमाज़ के रूप में ईश्वर के दरबार में हाज़िरी देना चाहते हैं तो हमें कैसा होना चाहिए? यह वह दरबार है जहां फरिश्ते और इस सृष्टि का कण कण उपासना करता है और उसका गुणगान करता है तो जब हम उनके साथ और इस पूरी सृष्टि के साथ मिलकर उसका गुणगान करना चाहते हैं तो हमारी तैयारी कैसी होनी चाहिए?
यही वजह है कि नमाज़ से पहले वूज़ू ज़रूरी है जो पवित्रता का एक साधन है। यूं तो वूज़ू में हाथ और मुंह को पानी से धोया जाता है लेकिन वास्तव में इसका अर्थ प्रकाश होता है। इस्लामी नियमों के अनुसार वूज़ू का अर्थ चेहरा और हाथों को धोना और फिर सिर और पैर पर नम हाथ फिराना है। इस तरह से हम देखते हैं कि जब कोई दिन में पांच बार इस तरह से हाथ और मुंह धोता है तो बहुत सी गंदगी साफ हो जाती है। इस तरह से बहुत से रोगों से इन्सान दूर रहता है। वूजू़ के दौरान नमाज़ पढ़ने वाला हाथ में पानी लेकर कई बार अपनी नाक में डालता है और इसका फायदा आज के विज्ञान से भी साबित हो चुका है।
आठवें इमाम, इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम वूज़ू के बारे में कहते हैं कि ईश्वर ने नमाज़ से पहले वूज़ू करने का आदेश दिया है ताकि ईश्वर के गुणगान के समय वह विदित रूप से गंदगी से दूर रहे और पवित्र रहे इसके साथ ही सुस्ती भी उससे दूर हो जाए और उसमें ताज़गी भर जाए जिससे वह इस सृष्टि के रचयता के सामने उपस्थित होने योग्य हो जाए। इस्लामी जगत के विख्यात बुद्धिजीवी शहीद सानी इस बारे में लिखते हैं कि बुद्धिमान लोगों को , शरीर को पवित्र करने और वूज़ू करने के बाद मन की पवित्रता का संकल्प करना चाहिए क्योंकि ईश्वर की उपासना के समय दिल को पवित्र होना चाहिए और उपासक के मन से स्वार्थ, घमंड, अधिकारों के हनन , दुर्भावना, अन्याय जैसे मन के रोगों को दूर करना चाहिए ताकि उसकी नमाज़ अपनी वांछित ऊंचाई और चरम तक पहुंच सके।
इस तरह से हम देखते हैं कि अगर कोई व्यक्ति दिन में पांच बार इन सारे सिद्धान्तों और नियमों पर ध्यान देते हुए नमाज़ पढ़ता है तो यह चीज़ उसकी आत्मा के प्रशिक्षण में काफी प्रभावी सिद्ध होती है। पैगम्बरे इस्लाम (स) ने एक उदाहरण देकर नमाज़ की भूमिका व प्रभाव को स्पष्ट किया है। वे कहते हैं कि अगर तुम में से किसी के घर में पानी की नहर बह रही हो और तुम हर रोज़ पांच बार खुद को उससे धोओ तो किया तुम्हारे शरीर पर गंदगी बाकी रहेगी? लोगों ने कहाः नहीं , तो पैगम्बरे इस्लाम ने कहा कि नमाज़ उसी नहर की तरह है जब भी कोई नमाज़ पढ़ता है तो उसके पाप धुल जाते हैं।
नमाज़ के बारे में बहुत से लोगों के मन में यह सवाल पैदा होता है कि क्या वजह है कि चौबीस घंटों में पांच बार नमाज़ पढ़ने का आदेश दिया गया है? इसके लिए यह कहा जाता है कि इन्सान के लिए कितनी अच्छी बात है कि वह अपने दिन का आरंभ ईश्वर की याद से करे क्योंकि सुबह के समय ही मनुष्य का मन और मस्तिष्क खाली रहता है और यह ईश्वर को याद करने का सब से अच्छा समय है क्योंकि दिन शुरु होते की उसकी व्यस्तता बढ़ती जाती है और अपने कामों में व्यस्त होकर वह ईश्वर को भूल सकता है इसी लिए दोपहर के समय की नमाज़ का आदेश दिया गया है ताकि वह काम के बीच अपने ईश्वर को याद कर सके। इसी तरह जब वह अपना दिन खत्म करने की तैयारी कर रहा होता है तो एक बार फिर अस्र की नमाज़ पढ़ कर ईश्वर को याद कर लेता है ताकि यह बता सके कि हे ईश्वर! मैं तुझे भूला नहीं हूं। इसी तरह जब दिन खत्म हो जाता है और सारे काम निपट जाते हैं तो वह सूरज डूबने के बाद की नमाज़ पढ़ता है और इस तरह से यह दर्शाता है कि उसका दिन ईश्वर के लिए समर्पित है।
अध्ययनों और अनुभवों से यह सिद्ध हो चुका है कि ईश्वर की याद में रहने वाला इन्सान दुखों और समस्याओं के मुकाबले में अधिक शक्तिशाली होता है और अवसाद जैसे मानसिक रोग उससे कोसों दूर रहते हैं यही वजह है कि धार्मिक समाजों में आत्महत्या जैसी घटनाएं या तो नहीं होतीं या बहुत कम होती हैं। इसकी एक वजह यह है कि ईश्वर में आस्था रखने वाला व्यक्ति कभी निराश नहीं होता और उसे हमेशा महान ईश्वर की ओर से मदद की उम्मीद रहती है। विशेष कर इस लिए भी ईश्वर ने कुरआने मजीद में स्वंय कहा है कि हे ईमान लाने वालो! रोज़ा और नमाज़ से मदद मांगो निश्चित रूप से ईश्वर संयमियों और डटे रहने वालों के साथ है। दोस्तो कार्यक्रम का समय समाप्त हुआ अनुमति दें खुदा हाफि़ज़।